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सीतामढ़ी की बेटी मान्या ने इसरो और नासा के मिशन में सुजनी कढ़ाई से बने स्मृति चिह्न को आईएसएस तक पहुंचाया है, जिससे बिहार की सांस्कृतिक विरासत को अंतरिक्ष में पहचान मिली है।

बिहार के सीतामढ़ी जिले के लिए यह गौरव का पल है। यहां की बेटी अब अंतरिक्ष तक पहुंच गई है। सीतामढ़ी की बेटी मान्या ने अपने हुनर और परंपरा से बिहार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई है। इसरो और नासा के संयुक्त मिशन के तहत अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) पर भेजे गए एक विशेष स्मृति चिह्न में बिहार की पारंपरिक सुजनी कढ़ाई को स्थान मिला है।

मान्या की महत्वपूर्ण भूमिका

सीतामढ़ी के साहू चौक निवासी अरविंद कुमार सिंह और पुष्पा कुमारी की पुत्री मान्या ने इस स्मृति चिह्न की डिजाइन तैयार करने वाली टीम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके साथ मुंगेर के ऋषभ शर्मा भी टीम का हिस्सा थे। यह स्मृति चिह्न भारतीय अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला के साथ 25 जून से 15 जुलाई तक के एक्सिओम-4 मिशन के दौरान आईएसएस ले जाया गया।

जानें कहां से मिली सफलता की प्रेरणा

मान्या ने बताया कि बचपन से गांव में बिछावन पर बनने वाली पारंपरिक डिजाइन ‘खेनाहा’ या सुजनी से उन्हें प्रेरणा मिली। उन्होंने सोचा कि अंतरिक्ष तक ऐसी डिजाइन पहुंचनी चाहिए, जो हमारी सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान दिलाए। इसी सोच ने उन्हें डिजाइन की दिशा में आगे बढ़ने और इस ऐतिहासिक उपलब्धि तक ले आई।

स्मृति चिह्न की विशेषता

स्मृति चिह्न धरती पर वर्गाकार होता है, लेकिन शून्य गुरुत्वाकर्षण में यह वृत्ताकार हो जाता है। यह पूर्णता और ब्रह्मांडीय बिंदु का प्रतीक है। इसके किनारों पर लगे धागे ‘ॐ’ की आवृत्ति को दर्शाते हैं, जिससे अंतरिक्ष में भी भारतीय आध्यात्मिकता और परंपरा का अनुभव कराया जा सके। इसमें प्रयुक्त सुजनी कढ़ाई ने इसे बिहार की सांस्कृतिक धरोहर से जोड़ दिया।

मान्या की शिक्षा और करियर

मान्या की प्रारंभिक पढ़ाई सीतामढ़ी से हुई। पटना से मैट्रिक और एफडीडीआई कोलकाता से स्नातक करने के बाद वे वर्तमान में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन (एनआईडी) अहमदाबाद से स्नातकोत्तर कर रही हैं। फिलहाल दिल्ली के एक संस्थान से इंटर्नशिप कर रही हैं। बचपन से ही प्रतिभाशाली मान्या का सपना है कि वह डिजाइन के क्षेत्र में अपने राज्य और जिले का एक विशिष्ट ब्रांड तैयार कर सके।

बिहार के लिए है गौरव

एनआईडी अहमदाबाद ने अंतरिक्ष नायकों के लिए भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले स्मृति चिह्नों की श्रृंखला तैयार कराई थी। इसी कड़ी में मान्या और उनकी टीम का यह प्रयास भारत की सांस्कृतिक पहचान को अंतरिक्ष तक ले जाने में सफल रहा। यह उपलब्धि न केवल सीतामढ़ी बल्कि पूरे बिहार के लिए गर्व का क्षण है। जिस कला और परंपरा को कभी गांव की चौखट तक सीमित माना जाता था। वहीं, आज अंतरिक्ष में भारतीयता की पहचान बन गई है। मान्या ने साबित कर दिया है कि यदि जुनून और लगन हो तो गांव की गलियों से निकली प्रतिभा भी अंतरिक्ष तक अपनी छाप छोड़ सकती है।