सरकार की घोषणाएं एवं विभाग के आकड़ों में फंसे किसान अधिक मूल्य देकर फसल की सिंचाई करने को मजबूर हैं। हर खेतों को सिंचाई सुविधा पहुंचाने के लिए सदैव से ही योजनाएं चलाई जा रही है। लेकिन, सभी योजनाएं धरातल पर नाकाम ही रही है। किसानों को मजबूरन निजी व भाड़े के पंपसेट से ही फसलों की सिंचाई करनी पड़ती है। सरकारी बोरिंग का हाल बेहाल है। लघु सिंचाई विभाग के अंतर्गत जिले में सिंचाई के लिए सरकारी नलकूप 349 हैं। जिसमें मात्र 184 ही विभाग द्वारा चालू बताया जा रहा है। बंद पड़े 165 में से किसी में बिजली खराबी, तो किसी में यांत्रिक खराबी बताई गई है। दो नलकूप ऐसे हैं, जिसे अब तक बिजली कनेक्शन ही नहीं मिल सका है। अधिकतर स्थानों पर नलकूप बंद है। कहीं नलकूप खराब पड़ा है, तो कहीं नलकूप का काम अधूरा है। कारण पैसा का आवंटन नहीं है।

तीन साल पहले भासर मछहा दक्षिणी के भेरिया टोला पर

पुराने नलकूप के निर्माण को लेकर 14.85 लाख का प्राक्कलन बना, उपलब्ध कराए गए 5.90 लाख रुपए से बोरिंग गाड़ दी गई। इसके बाद से न तो आवंटन मिला और न ही आगे का काम ही संपन्न कराया गया।

हरपुरबा पंचायत के हरपुरबा गांव का नलकूप महज दो वर्षों से मशीन की खराबी से बंद हो गया। लेकिन, केस 2 इसमें स्थापना काल से ही नाला नहीं बन सका। किसी प्रकार लोग सिंचाई किया करते थे, अब वह भी बंद हो गया है। इसके बाद से किसानों को निजि व भाड़े के पंप सेट से सिंचाई करना पड़ता है।

डुमरा के शंकर चौक के समीप राजकीय नल कूप स्थापित

केस 3 है। यह चालू अवस्था में भी है, नाला भी बने हुए हैं। लेकिन डुमरा के विकास के साथ ही अब खेतीहर जमीन आवासीय परिसर में बदल चुकी है। इससे अब महज सात से आठ एकड़ की ही सिंचाई हो रही है। नलकूप की देखभाल भी नदारद है।

बंद नलकूप चालू करवाने को लेकर लगातार कोशिश की जा रही है

“नलकूप अब पंचायतों को सौंप दिया गया है।

विभाग केवल उन्हें तकनीकी सहायता व उसके रख-रखाव एवं मरम्मत के लिए राशि मुहैया कराती लगातार कोशिश की जा रही है। – जितेंद्र कुमार दिवाकर, कार्यपालक अभियंता, लघु

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