मिलिए अमृता सागर से…शांत, शालीन…हर बात का नपा-तुला जवाब। अंग्रेजी में सिद्धहस्त, कंप्यूटर की भी जानकारी रखती हैं। उन्हें देखकर कोई ये अंदाजा भी नहीं लगा सकता कि एक साल पहले तक वे आरा स्टेशन के पास भीख मांगती थीं। करीब 36 वर्ष की अमृता की कहानी मजबूती के शिखर से गिरकर टूटने और टूटकर फिर खुद को जोड़कर खड़े होने की है।



छपरा की रहने वाली अमृता मनोविज्ञान में पोस्ट ग्रेजुएट हैं…66% अंकों के साथ फर्स्ट क्लास। कंप्यूटर एप्लीकेशन में डिप्लोमा भी किया था। पुलिस इंस्पेक्टर बनना चाहती थीं। पिता खगड़िया में एसडीएम थे, भाई एक निजी बैंक में मैनेजर। मगर पिता की जिद थी कि रिटायरमेंट से पहले बेटी की शादी कर देंगे। सम्मान को ठेस लगी थी… घाव भरने का समय देना सबसे जरूरी





समाज कल्याण विभाग के जिला सामाजिक सुरक्षा कोषांग की सहायक निदेशक स्नेहा व शांति कुटीर की प्रभारी राखी का कहना है कि अपनों से मिली उपेक्षा की वजह से अमृता किसी पर विश्वास नहीं कर रही थी। हमारे आश्वासन पर वह आ तो गई, पर उसमें खुद पर विश्वास जगाने में समय लगा। 15 दिन तक वह डरी-सहमी ही रही। हमने उसका ख्याल रखा। फिर जैसे-जैसे उसे सम्मान मिला। वह बात करने लगी। महीने भर में वह खुद को माहौल में ढाल पाई।

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