कहा जाता है कि बच्चों के समग्र विकास के लिए पढ़ाई के साथ-साथ खेल भी जरूरी है लेकिन बिहार के सरकारी स्कूलों में शायद खेल के साथ ही खेल हो रहा है. तभी तो 54634 स्कूलों में खेल के मैदान तक नहीं हैं. ये खुलासा यू डायस की रिपोर्ट में हुआ है कि ज्यादातर जिलों में स्कूलों में खेल की कक्षाएं तक संचालित नहीं हो रही हैं क्योंकि 70 प्रतिशत स्कूलों में खेल के मैदान ही नहीं हैं. रिपोर्ट के मुताबिक सबसे खराब हालत पटना की है.

यहां 4193 स्कूलों में 2826 के पास खेल के मैदान नहीं हैं, भले ही शिक्षा विभाग के निर्देश के मुताबिक सभी स्कूलों में खेल की कक्षाएं संचालित करना अनिवार्य है लेकिन शिक्षक करें तो क्या करें. मजबूरन खेल की कक्षाएं चाहकर भी संचालित नहीं कर पा रहे हैं और इसकी जानकारी स्कूलों की तरफ से समय-समय पर सरकार को दी भी जाती है. विडम्बना देखिए कि पटना के 19 से अधिक हाई और प्लस 2 स्कूल अब भी किराये के मकान में चलते हैं जहां जगह कम और स्टूडेंट ज्यादकी हालत में बैठने में भी परेशानी होती है.

पटना के बीएन कॉलेजिएट स्कूल की रूटीन में तो अब तक खेल की कक्षाएं जोड़ी भी नहीं गई है जिसकी वजह से यहां के स्टूडेंट खेल से शुरू से वंचित हैं. कई वर्षों से स्कूलों में फिजिकल टीचर की भी बहाली नहीं हुई है जिसके कारण ज्यादातर स्कूलों में खेल के शिक्षक भी नहीं हैं और जहां हैं वहां वो दूसरे विषय की पढ़ाई करवाते हैं, क्योंकि खेल का मैदान नहीं है. पीएम मोदी ने खेलो इंडिया कार्यक्रम के तहत खेल को बढावा देने का प्रयास जरूर किया लेकिन बिहार के स्कूल मानकों पर खरे तक नहीं उतर रहे हैं.

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